भगत सिंह की जीवनी – भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को पंजाब के लायलपुर ज़िले (वर्तमान पाकिस्तान) के बंगा गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह तथा माता का नाम विद्यावती कौर था। उनके पिता किशन सिंह और चाचा अजीत सिंह दोनों ही सक्रिय स्वतंत्रता सेनानी थे। भगत सिंह बचपन से ही वीर एवं देशभक्त प्रवृत्ति के थे। आगे चलकर उन्होंने देश को आज़ाद कराने के उद्देश्य से स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रूप से भाग लिया।

भगत सिंह की जीवनी – बचपन से लेकर असहयोग आंदोलन तक (2026)
बचपन में भगत सिंह की दादी उन्हें “भागांवाला” कहकर पुकारती थीं, क्योंकि जिस दिन उनका जन्म हुआ था, उसी दिन उनके चाचा अजीत सिंह जेल से रिहा होकर घर लौटे थे। “भागांवाला” का अर्थ होता है भाग्यशाली। बाद में उनका नाम भगत सिंह रखा गया।
महात्मा गांधी के नेतृत्व में वर्ष 1920 में असहयोग आंदोलन चलाया गया, जिसका उद्देश्य अंग्रेज़ी शासन का पूर्ण बहिष्कार करना था। लेकिन चौरी-चौरा कांड में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई हिंसक घटना के बाद महात्मा गांधी ने यह कहते हुए आंदोलन वापस ले लिया कि देश अभी पूर्ण रूप से स्वतंत्रता के लिए तैयार नहीं है। इसके बाद गांधी जी और भगत सिंह की विचारधाराओं में स्पष्ट अंतर दिखाई देने लगा। गांधी जी अहिंसा के समर्थक थे, जबकि भगत सिंह का मानना था कि केवल अहिंसा और प्रेम के माध्यम से अंग्रेज़ों से स्वतंत्रता प्राप्त करना संभव नहीं होगा।
भगत सिंह की जीवनी – नौजवान सभा से लेकर हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन तक
देश को स्वतंत्र कराने के उद्देश्य से भगत सिंह ने सबसे पहले नौजवान सभा की स्थापना की। बाद में वे हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़ गए। आगे चलकर इस संगठन का नाम हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) रखा गया। इस संगठन का उद्देश्य त्याग, बलिदान और संघर्ष के माध्यम से भारत को स्वतंत्र तथा समृद्ध राष्ट्र बनाना था।
भगत सिंह द्वारा सॉन्डर्स की हत्या
वर्ष 1928 में साइमन कमीशन के विरोध के दौरान 30 अक्टूबर को लाहौर में एक विशाल प्रदर्शन आयोजित किया गया, जिसका नेतृत्व लाला लाजपत राय कर रहे थे। प्रदर्शन के दौरान अंग्रेज़ पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया, जिसमें लाला लाजपत राय गंभीर रूप से घायल हो गए। कुछ दिनों बाद उनकी मृत्यु हो गई। इस घटना से भगत सिंह और उनके साथियों में अंग्रेज़ी शासन के प्रति गहरा आक्रोश उत्पन्न हुआ। उन्होंने लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने का निर्णय लिया।
17 दिसंबर 1928 को भगत सिंह, राजगुरु, चंद्रशेखर आज़ाद तथा अन्य क्रांतिकारी साथियों ने लाहौर में ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जॉन पी. सॉन्डर्स की गोली मारकर हत्या कर दी। इसके बाद सभी क्रांतिकारी योजनाबद्ध तरीके से वहाँ से निकलने में सफल रहे।
भगत सिंह द्वारा केंद्रीय विधानसभा में बम क्यों फेंका गया?
भगत सिंह और उनके साथियों का उद्देश्य अपने क्रांतिकारी विचारों को पूरे देश तक पहुँचाना था। उनका इरादा किसी की हत्या करना नहीं था, बल्कि अंग्रेज़ सरकार का ध्यान भारतीय जनता की आवाज़ की ओर आकर्षित करना था। इसी उद्देश्य से उन्होंने दिल्ली स्थित केंद्रीय विधानसभा (सेंट्रल असेम्बली) में बम फेंकने की योजना बनाई।
8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने केंद्रीय विधानसभा में ऐसे स्थान पर बम फेंका जहाँ किसी की जान न जाए। बम फेंकने के बाद दोनों वहाँ से भागे नहीं, बल्कि स्वयं को अंग्रेज़ पुलिस के हवाले कर दिया। उनका मानना था कि यदि वे भाग जाते, तो जनता उन्हें केवल हिंसक क्रांतिकारी समझती। वे अदालत को अपने विचार पूरे देश तक पहुँचाने का माध्यम बनाना चाहते थे। इसी दौरान उन्होंने “इंकलाब ज़िंदाबाद” और “साम्राज्यवाद मुर्दाबाद” के नारे भी लगाए।
भगत सिंह द्वारा जेल में भूख हड़ताल क्यों की गई?
गिरफ्तारी के बाद भगत सिंह ने जेल में देखा कि भारतीय कैदियों के साथ भेदभाव किया जाता था। उन्हें न तो पर्याप्त भोजन दिया जाता था और न ही अच्छे कपड़े या पढ़ने-लिखने की सुविधाएँ उपलब्ध थीं। इसके विपरीत अंग्रेज़ कैदियों को बेहतर भोजन, वस्त्र और अन्य सुविधाएँ दी जाती थीं। इस अन्याय के विरोध में भगत सिंह तथा उनके साथियों ने जेल में भूख हड़ताल शुरू कर दी।
यह भूख हड़ताल लगभग 63 दिनों तक चली। इस दौरान भगत सिंह ने केवल पानी के सहारे अपना संघर्ष जारी रखा। माना जाता है कि इस हड़ताल के कारण उनका वजन भी काफी कम हो गया था। अंततः अंग्रेज़ सरकार को भारतीय कैदियों के साथ होने वाले भेदभाव में सुधार करने के लिए मजबूर होना पड़ा।
भगत सिंह को 7 अक्टूबर 1930 को अदालत द्वारा फांसी की सजा
7 अक्टूबर 1930 को अदालत ने भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को सॉन्डर्स हत्याकांड तथा अन्य मामलों में दोषी ठहराते हुए फांसी की सजा सुनाई। उन पर भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के अंतर्गत मुकदमा चलाया गया। इसके बाद तीनों क्रांतिकारियों ने अपने सिद्धांतों पर अडिग रहते हुए देश की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष जारी रखा।
भगत सिंह को फांसी, अंतिम इच्छा, नारा और कविता
23 मार्च 1931 की शाम जब भगत सिंह जेल में लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे, तभी जेल अधिकारी उन्हें फांसी की तैयारी के लिए बुलाने आए। कहा जाता है कि उन्होंने पुस्तक को ऊपर उछालते हुए मुस्कराकर कहा, “ठहरो, पहले एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिल तो ले।” इसके बाद वे अपने साथियों राजगुरु और सुखदेव के साथ हँसते-हँसते फांसी के तख्ते की ओर बढ़ गए।
भगत सिंह की सबसे बड़ी इच्छा भारत को अंग्रेज़ी शासन से स्वतंत्र देखना थी। अपने अंतिम क्षणों में उन्होंने अपने साथियों से गले मिलकर देश के लिए बलिदान देने का संकल्प दोहराया।
फांसी दिए जाने के बाद अंग्रेज़ सरकार ने उनके पार्थिव शरीर को परिवार को सौंपने के बजाय गुप्त रूप से सतलुज नदी के किनारे ले जाकर अंतिम संस्कार करने का प्रयास किया। जब स्थानीय लोगों और उनके परिजनों को इसकी जानकारी मिली, तब वे वहाँ पहुँचे। बाद में उनके अवशेषों को एकत्र कर पूरे सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया।
इंकलाब ज़िंदाबाद
साम्राज्यवाद मुर्दाबाद
मेरा रंग दे, मेरा रंग दे,
मेरा रंग दे बसंती चोला।
भगत सिंह ने भारत की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। उनका साहस, त्याग और देशभक्ति आज भी करोड़ों भारतीयों को प्रेरित करती है। आशा है कि इस लेख के माध्यम से आपको भगत सिंह के जीवन, उनके संघर्ष और देश के प्रति उनके अमूल्य योगदान के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई होगी।